Swami Vivekananda Biography in Hindi | स्वामी विवेकानन्द | About Swami Vivekananda

“उठो, जागो और तब तक रुको नहीं
जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये !!″

Swami Vivekananda Biography in Hindi स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी, जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों" के साथ करने के लिए जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण दर्शन विदेशो में स्वामी विवेकानंद की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। भारत में हिंदु धर्म को बढ़ाने में उनकी मुख्य भूमिका रही और भारत को औपनिवेशक बनाने में उनका मुख्य सहयोग रहा। 

Swami Vivekananda Biography in Hindi | About Swami Vivekananda

जन्म दिनांक एवं जन्म स्थान 

स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को मकर संक्रांति के समय उनके पैतृक घर कलकत्ता के गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट में हुआ। जो ब्रिटिशकालीन भारत की राजधानी थी। उनका जन्म कलकत्ता के बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। विवेकानंद के पैतृक मकान को 3 गोरलेन मुखर्जी लेन में बदल दिया गया है।  

माता-पिता और परिवार 

इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त तथा माता का नाम श्रीमती भुवनेश्वरी देवी था। इनके दादा का नाम दुर्गाचरण दत्त था। 

विश्वनाथ और भुवनेश्वरी के कुल 10 संतानें थी। चार बेटे और छह बेटियां थीं। जिसमें केवल 4 संतानें ही जीवित बच पाईं। उनकी पहली संतान पुत्र थी जो मात्र 8 महीने में चल बसी थी। एक बेटा बचपन में ही मर गया। उनकी दूसरी बेटी जो ढाई साल जी पाई। उनके अगले तीन बच्चे बेटियाँ थे। तीसरी संतान हरामोनी देवीं थीं, जिनकी उम्र 22 साल थी. परिवार की चौथी संतान स्वर्णमयी देवी थीं. वो अपने भाई-बहनों में सबसे लंबे समय तक जीवित रहीं. उनकी उम्र 72 साल थी। भुवनेश्वरी देवी की पांचवीं संतान भी लड़की थी, जो 05 साल से ज्यादा नहीं जी पाई. विवेकानंद छठे नंबर की संतान थे। उनकी सातवीं और आठवीं संतान दोनों बेटियां थीं। सातवीं संतान किरणबाला देवी थीं. जो 16 या 18 साल की उम्र तक जीवित रहीं. आठवीं संतान जोगिंद्रबाला देवी थीं. जिन्होंने 25 साल की उम्र में 1881 में शिमला में आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद विवेकानंद के छोटे भाई महेंद्र नाथ और भूपेंद्र नाथ का जन्म हुआ. जो लंबे समय तक जीवित रहे, उसमें भूपेंद्र दत्त और महेंद्र दत्त थे. इसके अलावा अन्य भाई-बहनों का भी कोई उल्लेख नहीं मिलता. शायद उनकी मृत्यु भी जल्दी ही हो गई. महेंद्र दत्त भारतीय क्रांतिकारी बने. बाद में वो जाने माने समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी के तौर पर काम किया. अंतिम दो पुत्र हुए जिनके नाम महेंद्रनाथ और भूपेंद्रनाथ थे। इन दोनों ने लम्बे समय तक जीवन जिया। 

स्वामीजी की माँ ने हमेशा अपने बच्चों को सच्चा, पवित्र, प्रतिष्ठित और मानवीय होने की सलाह दी।  . दूसरे बच्चे के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती. ये एक लड़की थी,   रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रकाशित विवेकानंद जीवनी के अनुसार स्वर्णमयी और विवेकानंद के बीच एक अच्छी बांडिंग थी. छोटे नरेंद्र उनके साथ ना केवल ज्यादा रहे बल्कि उनके साथ शरारतें भी करते थे.

बचपन

स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। उनके पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। नरेंद्र के दादा दुर्गाचरण दत्ता संस्कृत और फारसी के विद्वान थे। उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की।

बचपन से ही नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिल ने पर अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके माता पिता को कई बार उन्हें सँभालने और समझने में परेशानी होती थी. उनकी माता हमेशा कहती थी की, “मैंने शिवजी से एक पुत्र की प्रार्थना की थी, और उन्होंने तो मुझे एक शैतान ही दे दिया” । 

उनकी माता, भुवनेश्वरी देवी एक देवभक्त गृहिणी थी. स्वामीजी के माता और पिता के अच्छे संस्कारो और अच्छी परवरिश के कारण स्वामीजी के जीवन को एक अच्छा आकार और एक उच्चकोटि की सोच मिली। वे हमेशा भगवान की तस्वीरों जैसे शिव, राम और सीता के सामने ध्यान लगाकर साधना करते थे. साधुओ और सन्यासियों की बाते उन्हें हमेशा प्रेरित करती रही। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था। धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। 

परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।

पिता की मृत्यु

दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दर्रिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

स्वामी विवेकानंद शिक्षा Swami Vivekananda Education

स्वामी विवेकानंद शिक्षा Swami Vivekananda Education नरेंद्र को 1871 में, 8 वर्ष की आयु में, इश्वर चन्द्र विद्यासागर मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूट में डाला गया। 1877 में जब उनका परिवार रायपुर स्थापित हुआ तब तक नरेंद्र ने उस स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। 1879 में, उनके परिवार के कलकत्ता वापिस आ जाने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में फर्स्ट डिवीज़न लाने वाले वे पहले विद्यार्थी बने। वे विभिन्न विषयो जैसे दर्शन शास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य के उत्सुक पाठक थे। हिंदु धर्मग्रंथो में भी उनकी बहोत रूचि थी जैसे वेद, उपनिषद, भगवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराण आदि। नरेंद्र भारतीय पारंपरिक संगीत में निपुण थे और हमेशा शारीरिक योग, खेल और सभी गतिविधियों में सहभागी होते थे। 

नरेंद्र ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी जीवन और यूरोपियन इतिहास की भी पढाई जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट से कर रखी थी। 1881 में, उन्होंने ललित कला की परीक्षा पास की और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी की।

नरेंद्र ने डेविड ह्यूम, इमैनुएल कांट, जोहान गोटलिब फिच, बारूक स्पिनोज़ा, जोर्ज डब्लू एच हेजेल, आर्थर स्कूपइन्हार, ऑगस्ट कॉम्टे, जॉन स्टुअर्ट मिल और चार्ल्स डार्विन के कामों का अध्यन किया। उन्होंने स्पेंसर की किताब एजुकेशन (1861) का बंगाली में अनुवाद किया। ये हर्बर्ट स्पेंसर के विकासवाद से काफी मोहित थे। पश्चिम दार्शनिकों के अध्यन के साथ ही इन्होंने संस्कृत ग्रंथों और बंगाली साहित्य को भी सीखा।    

रामकृष्ण के साथ Swami Vivekananda Teacher Ramakrushna

1881 में नरेंद्र पहली बार रामकृष्ण से मिले, जिन्होंने नरेंद्र के पिता की मृत्यु पश्च्यात मुख्य रूप से नरेंद्र पर आध्यात्मिक प्रकाश डाला.

जब William Hastie जनरल असेंबली संस्था में William Wordsworth की कविता “पर्यटन” पर भाषण दे रहे थे, तब नरेंद्र ने अपने आप को रामकृष्ण से परिचित करवाया था. जब वे कविता के एक शब्द “Trance” का मतलब समझा रहे थे, तब उन्होंने अपने विद्यार्थियों से कहा की वे इसका मतलब जानने के लिए दक्षिणेश्वर में स्थित रामकृष्ण से मिले. उनकी इस बात ने कई विद्यार्थियों को रामकृष्ण से मिलने प्रेरित किया, जिसमे नरेंद्र भी शामिल थे.

वे व्यक्तिगत रूप से नवम्बर 1881 में मिले, लेकिन नरेंद्र उसे अपनी रामकृष्ण के साथ पहली मुलाकात नहीं मानते, और ना ही कभी किसी ने उस मुलाकात को नरेंद्र और रामकृष्ण की पहली मुलाकात के रूप में देखा. उस समय नरेंद्र अपनी आने वाली F.A.(ललित कला) परीक्षा की तयारी कर रहे थे. जब रामकृष्ण को सुरेन्द्र नाथ मित्र के घर अपना भाषण देने जाना था, तब उन्होंने नरेंद्र को अपने साथ ही रखा. परांजपे के अनुसार, ”उस मुलाकात में रामकृष्ण ने युवा नरेंद्र को कुछ गाने के लिए कहा था. और उनके गाने की कला से मोहित होकर उन्होंने नरेंद्र को अपने साथ दक्षिणेश्वर चलने कहा.

1881 के अंत और 1882 में प्रारंभ में, नरेंद्र अपने दो मित्रो के साथ दक्षिणेश्वर गये और वह वे रामकृष्ण से मिले. उनकी यह मुलाकात उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग-पॉइंट बना. उन्होंने जल्द ही रामकृष्ण को अपने गुरु के रूप में स्वीकार नही किया, और ना ही उनके विचारो के विरुद्ध कभी गये. वे तो बस उनके चरित्र से प्रभावित थे इसीलिए जल्दी से दक्षिणेश्वर चले गये. उन्होंने जल्द ही रामकृष्ण के परम आनंद और स्वप्न को ”कल्पनाशक्ति की मनगढ़त बातो” और “मतिभ्रम” के रूप में देखा. ब्रह्म समाज के सदस्य के रूप में, वे मूर्ति पूजा, बहुदेववाद और रामकृष्ण की काली देवी के पूजा के विरुद्ध थे. उन्होंने अद्वैत वेदांत के “पूर्णतया समान समझना” को इश्वर निंदा और पागलपंती समझते हुए अस्वीकार किया और उनका उपहास भी उड़ाया. नरेंद्र ने रामकृष्ण की परीक्षा भी ली, जिन्होंने (रामकृष्ण) उस विवाद को धैर्यपूर्वक सहते हुए कहा, ”सभी दृष्टिकोणों से सत्य जानने का प्रयास करे”.

नरेंद्र के पिता की 1884 में अचानक मृत्यु हो गयी और परिवार दिवालिया बन गया था, साहूकार दिए हुए कर्जे को वापिस करने की मांग कर रहे थे, और उनके रिश्तेदारों ने भी उनके पूर्वजो के घर से उनके अधिकारों को हटा दिया था. नरेंद्र अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करना चाहते थे, वे अपने महाविद्यालय के सबसे गरीब विद्यार्थी बन चुके थे. असफलता पूर्वक वे कोई काम ढूंडने में लग गये और भगवान के अस्तित्व का प्रश्न उनके सामने निर्मित हुआ, जहा रामकृष्ण के पास उन्हें तसल्ली मिली और उन्होंने दक्षिणेश्वर जाना बढ़ा दिया.

एक दिन नरेंद्र ने रामकृष्ण से उनके परिवार के आर्थिक भलाई के लिए काली माता से प्रार्थना करने कहा. और रामकृष्ण की सलाह से वे तिन बार मंदिर गये, लेकिन वे हर बार उन्हें जिसकी जरुरत है वो मांगने में असफल हुए और उन्होंने खुद को सच्चाई के मार्ग पर ले जाने और लोगो की भलाई करने की प्रार्थना की. उस समय पहल;ई बार नरेंद्र ने भगवान् की अनुभूति की थी और उसी समय से नरेंद्र ने रामकृष्ण को अपना गुरु मान लिया था.

1885 में, रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ, और इस वजह से उन्हें कलकत्ता जाना पड़ा और बाद में कोस्सिपोरे गार्डन जाना पड़ा. नरेंद्र और उनके अन्य साथियों ने रामकृष्ण के अंतिम दिनों में उनकी सेवा की, और साथ ही नरेंद्र की आध्यात्मिक शिक्षा भी शुरू थी. कोस्सिपोरे में नरेंद्र ने निर्विकल्प समाधी का अनुभव लिया. नरेंद्र और उनके अन्य शिष्यों ने रामकृष्ण से भगवा पोशाक लिया, तपस्वी के समान उनकी आज्ञा का पालन करते रहे. रामकृष्ण ने अपने अंतिम दिनों में उन्हें सिखाया की मनुष्य की सेवा करना ही भगवान की सबसे बड़ी पूजा है. रामकृष्ण ने नरेंद्र को अपने मठवासियो का ध्यान रखने कहा, और कहा की वे नरेंद्र को एक गुरु की तरह देखना चाहते है. और रामकृष्ण 16 अगस्त 1886 को कोस्सिपोरे में सुबह के समय भगवान को प्राप्त हुए.

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की चिंता किये बिना, स्वयं के भोजन की चिंता किये बिना वे गुरु-सेवा में सतत संलग्न रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था।

आध्यात्मिक शिक्षुता – ब्रह्म समाज का प्रभाव

1880 में नरेंद्र, ईसाई से हिन्दू धर्म में रामकृष्ण के प्रभाव से परिवर्तित केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हुए, नरेंद्र 1884 से पहले कुछ बिंदु पर, एक फ्री मसोनरी लॉज और साधारण ब्रह्म समाज जो ब्रह्म समाज का ही एक अलग गुट था और जो केशव चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में था। 1881-1884 के दौरान ये सेन्स बैंड ऑफ़ होप में भी सक्रीय रहे जो धूम्रपान और शराब पीने से युवाओं को हतोत्साहित करता था।

यह नरेंद्र के परिवेश के कारण पश्चिमी आध्यात्मिकता के साथ परिचित हो गया था। उनके प्रारंभिक विश्वासों को ब्रह्म समाज ने जो एक निराकार ईश्वर में विश्वास और मूर्ति पूजा का प्रतिवाद करता था, ने प्रभावित किया और सुव्यवस्थित, युक्तिसंगत, अद्वैतवादी अवधारणाओं, धर्मशास्त्र, वेदांत और उपनिषदों के एक चयनात्मक और आधुनिक ढंग से अध्यन पर प्रोत्साहित किया।

निष्ठा

एक बार किसी शिष्य ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखाते हुए नाक-भौं सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को क्रोध आ गया। वे अपने उस गुरु भाई को सेवा का पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को समझ सके और स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। और आगे चलकर समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भण्डार की महक फैला सके। ऐसी थी उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा जिसका परिणाम सारे संसार ने देखा।

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। उनके गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत व स्वयं के भोजन की चिन्ता किये बिना वे गुरु की सेवा में सतत संलग्न रहे।

विवेकानन्द बड़े स्‍वप्न‍दृष्‍टा थे। उन्‍होंने एक ऐसे समाज की कल्‍पना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद न रहे। उन्‍होंने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएँ थीं। आज के युवकों के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है। उनके नाना जी का नाम श्री नंदलाल बसु था।

सम्मलेन

मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो,

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया हैं उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा हैं। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूँ; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूँ।

मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत- दोनों की ही शिक्षा दी हैं। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है।

मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने महान जरथुष्ट जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है। भाईयो मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ जिसकी आवृति मैं बचपन से कर रहा हूँ और जिसकी आवृति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं:

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

अर्थात: जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।

यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वतः ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है:

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

अर्थात: जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।

साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

यात्राएँ

28 वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानन्द उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचे। योरोप-अमरीका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे।

वहाँ लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानन्द को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। परन्तु एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला। उस परिषद् में उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गये। फिर तो अमरीका में उनका अत्यधिक स्वागत हुआ। वहाँ उनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय बन गया। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।

“अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा” यह स्वामी विवेकानन्द का दृढ़ विश्वास था। अमरीका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएँ स्थापित कीं। अनेक अमरीकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को ‘गरीबों का सेवक’ कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशान्तरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया। जब भी वो कहीं जाते थे तो लोग उनसे बहुत खुश होते थे।

विवेकानन्द का योगदान तथा महत्व

उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी विवेकानंद जो काम कर गए, वे आनेवाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

तीस वर्ष की आयु में स्वामी विवेकानंद ने शिकागो, अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और उसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई। गुरुदेव रवींन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, ‘‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।’’

रोमां रोलां ने उनके बारे में कहा था, ‘‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देखकर ठिठककर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक चिल्ला उठा, ‘शिव !’ यह ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।’’

वे केवल संत ही नहीं थे, एक महान् देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था, ‘‘नया भारत निकल पड़े मोदी की दुकान से, भड़भूंजे के भाड़ से, कारखाने से, हाट से, बाजार से; निकल पडे झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, पर्वतों से।’’ और जनता ने स्वामीजी की पुकार का उत्तर दिया। वह गर्व के साथ निकल पड़ी। गांधीजी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला, वह विवेकानंद के आह्वान का ही फल था। इस प्रकार वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं व ऋषियों का जन्म हुआ, यही संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं—केवल यहीं—आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है। उनके कथन—
‘‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक रुको नहीं जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।’’ 

मृत्यु 

4 जुलाई 1902 (उनकी मृत्यु का दिन) को विवेकानंद सुबह जल्दी उठे, और बेलूर मठ के पूजा घर में पूजा करने गये और बाद में 3 घंटो तक योग भी किया. उन्होंने छात्रो को शुक्ल-यजुर-वेद, संस्कृत और योग साधना के विषय में पढाया, बाद में अपने सहशिष्यों के साथ चर्चा की और रामकृष्ण मठ में वैदिक महाविद्यालय बनाने पर विचार विमर्श किये. 7 P.M. को विवेकानंद अपने रूम में गये, और अपने शिष्य को शांति भंग करने के लिए मन किया, और 9 P.M को योगा करते समय उनकी मृत्यु हो गयी. उनके शिष्यों के अनुसार, उनकी मृत्यु का कारण उनके दिमाग में रक्तवाहिनी में दरार आने के कारन उन्हें महासमाधि प्राप्त होना है. उनके शिष्यों के अनुसार उनकी महासमाधि का कारन ब्रह्मरंधरा (योगा का एक प्रकार) था. उन्होंने अपनी भविष्यवाणी को सही साबित किया की वे 40 साल से ज्यादा नहीं जियेंगे. बेलूर की गंगा नदी में उनके शव को चन्दन की लकडियो से अग्नि दी गयी। 

स्वामी विवेकानन्द जी की महासमाधि!!

विवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्वभर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-“एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।” उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन 4 जुलाई 1902 को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकी अंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था।

उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरु रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये 130 से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।

राष्ट्रीय युवा दिवस National Youth Day 12 January

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन से कई युवाओं को प्रेरित किया और आज भी इस देश के युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। उनके जन्मदिन 12 जनवरी को हर साल 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के रूप में मनाया जाता है। 

महत्त्वपूर्ण तिथियाँ

12 जनवरी,1863 : कलकत्ता में जन्म


सन् 1879 : प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश


सन् 1880 : जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश


नवंबर 1881 : श्रीरामकृष्ण से प्रथम भेंट


सन् 1882-86 : श्रीरामकृष्ण से संबद्ध


सन् 1884 : स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास


सन् 1885 : श्रीरामकृष्ण की अंतिम बीमारी


16 अगस्त, 1886 : श्रीरामकृष्ण का निधन


सन् 1886 : वराह नगर मठ की स्थापना


जनवरी 1887 : वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा


सन् 1890-93 : परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण


25 दिसंबर, 1892 : कन्याकुमारी में


13 फरवरी, 1893 : प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकंदराबाद में


31 मई, 1893 : बंबई से अमेरिका रवाना


25 जुलाई, 1893 : वैंकूवर, कनाडा पहुँचे


30 जुलाई, 1893 : शिकागो आगमन


अगस्त 1893 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन राइट से भेंट


11 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान


27 सितंबर, 1893 : विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अंतिम व्याख्यान


16 मई, 1894 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषण


नवंबर 1894 : न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना


जनवरी 1895 : न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ


अगस्त 1895 : पेरिस में


अक्तूबर 1895 : लंदन में व्याख्यान


6 दिसंबर, 1895 : वापस न्यूयॉर्क


22-25 मार्च, 1896 : वापस लंदन


मई-जुलाई 1896 : हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान


15 अप्रैल, 1896 : वापस लंदन


मई-जुलाई 1896 : लंदन में धार्मिक कक्षाएँ


28 मई, 1896 : ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट


30 दिसंबर, 1896 : नेपल्स से भारत की ओर रवाना


15 जनवरी, 1897 : कोलंबो, श्रीलंका आगमन


6-15 फरवरी, 1897 : मद्रास में


19 फरवरी, 1897 : कलकत्ता आगमन


1 मई, 1897 : रामकृष्ण मिशन की स्थापना


मई-दिसंबर 1897 : उत्तर भारत की यात्रा


जनवरी 1898: कलकत्ता वापसी


19 मार्च, 1899 : मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना


20 जून, 1899 : पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा


31 जुलाई, 1899 : न्यूयॉर्क आगमन


22 फरवरी, 1900 : सैन फ्रांसिस्को में वेदांत समिति की स्थापना


जून 1900 : न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा


26 जुलाई, 1900 : यूरोप रवाना


24 अक्तूबर, 1900 : विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा


26 नवंबर, 1900 : भारत रवाना


9 दिसंबर, 1900 : बेलूर मठ आगमन


जनवरी 1901 : मायावती की यात्रा


मार्च-मई 1901 : पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा


जनवरी-फरवरी 1902 : बोधगया और वारणसी की यात्रा


मार्च 1902 : बेलूर मठ में वापसी


4 जुलाई, 1902 : महासमाधि।

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त :-

स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –

१. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।

२. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने।

३. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।

४. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।

५. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।

६. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।

७. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।

८. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।

९. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।

१०. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।

1.महिलाओं का सम्मान

अमेरिका में, एक महिला ने विवेकानंद से कहा, मैं आप से शादी करना चाहती हूँ। जवाब में फिर सवाल था लेकिन क्यों, आप ऐसा क्यों चाहती है? महिला का उत्तर था मैं आपकी बुद्धि पर मोहित हूँ। मुझे भी आपकी जैसा बुद्धिमान पुत्र की कामना है। इसी वजह से आपसे शादी करना चाह रही हूँ। यानी मूल प्रश्न यह है की क्या आप मुझसे शादी फिर मुझे अच्छा आपने जैसा एक बच्चा दे सकते हैं?

विवेकानंदजी ने कहा, क्योंकि आप सिर्फ बुद्धि पर मोहित है, इसलिए कोई समस्या नहीं है। प्रिय, मैं आपकी इच्छा को समझता हूँ, शादी करना और इस दुनिया में एकबच्चे को लानाऔर फिर जाने की वे बुद्धिमान है की नहीं, इसमें बहुत समय लगेगा। बच्चा बुद्धिमान होगा यह नहीं। इसकी गारंटी भी नहीं है। मैं आपको एक अन्य सुझाव दे सकता हूँ आप मुझे, अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लें, इस प्रकार आप मेरी माँ बन जाएगी और मेरे जैसे बुद्धिमान बच्चा पाने की इच्छा भी पूरी हो जाएगी।

स्वामी विवेकानंद ने संन्यास धारण कर लिया था। उन्होंने गृहस्थी छोड़कर नर सेवा से नारायण सेवा का संकल्प लिया था समाज और उनके उत्थान के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते थे। वेद वेदांत, धर्म आदि के महत्व को जनसामान्य तक पहुंचाने के लिए वह संघर्षरत थे।

2.सदाचरण की भावना ही सर्वश्रेष्ठ भावना है

एक समय की बात है स्वामीजी को अपने आश्रम लौट आना था। वह तांगे सी उतरकर वृक्ष की छाया में बैठ गए। वृक्ष के नीचे बैठे बैठे काफी समय हो गया। कुछ समय बाद वहाँ से सभी लोग चले गए। फिर भी स्वामीजी वहाँ यथास्थिति बैठे रहे।

एक सज्जन स्वामी जी को काफी देर से देख रहा था। उसके मन में जिज्ञासा हुई, चलकर हाल पूछा जाए। स्वामी जी ने पास पहुँचकर शिष्टाचार से प्रणाम किया, उनका हालचाल जाना। स्वामी जी ने बाद में सज्जन व्यक्ति को बताया उनके पास आगे की यात्रा करने की राशि नहीं है, इसलिए वह यहाँ विश्राम करने को रुके हैं।

सज्जन व्यक्ति के पूछने पर स्वामीजी ने बताया उन्होंने कल से कुछ खाया पिया भी नहीं है। भक्ति स्वामी जी को अपने घर ले गया, घर पर उनका खूब आदर सत्कार हुआ।

सज्जन व्यक्ति ने पूछने पर कि उनके थैले में क्या है?

स्वामी जी ने बताया गीता की पुस्तक और एक बाईबल है।

व्यक्ति को आश्चर्य हुआ। धर्म की पुस्तक की उनकी थाली में एक साथ कैसे?

स्वामी जी ने बताया अपने धर्म संप्रदाय पंथ आदि को कोई दुराग्रह नहीं है। हमें किसी भी माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति हो, वह मार्ग कोई भी हो सकता है।

व्यक्ति ने प्रश्न किया संन्यास जीवन में किस की आवश्यकता अधिक होती है। इस पर स्वामी जी ने कहा संन्यास जीवन में स्वयं की होती है उसके अतिरिक्त किसी और की नहीं।

जो सदाचरण करता है उससे बढ़कर कोई और संन्यासी नहीं हो सकता। 

3.माँ की महिमा

एक बार एक जिज्ञासु ने स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, संसार मेंमाँ की महानता क्यों गायी जाती है? स्वामीजी ने इस पर मुस्कुराते हुए इस व्यक्ति से पूछा, पांच सीट का एक पत्थर ले आओ, जब वह व्यक्ति पत्थर ले आया, तो स्वामी जी ने कहा इसी कपड़े से लपेटकरपेड़ पर बादलों और 24 घंटे बाद मेरे पास आओ।

उस आदमी ने ऐसा ही किया, लेकिन कुछ घंटों में उसके लिए काम करना मुश्किल हो गया उसी दिन में ही तारे नजर आने लगे तब वह थका मांदा स्वामी जी के पास आया और बोला, अब मैं इस बोझ को और नहीं उठा सकता अपने एक सवाल पूछने की इतनी बड़ी सजा मुझे क्यों दी?

स्वामीजी ने कहा इस पत्थर का बोझ तुम से कुछ घंटे भी नहीं सहा गया और माँ पूरी नौ माह तक शिशु का बोझ उठाती है इस बूझ के साथ यह सारा काम करती है और कभी विचलित नहीं होती माँ से ज्यादा सहनशील कौन है? इसलिए माँ की महिमा सबसे ज्यादा है।

उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थी। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, #प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैये ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की। 

विवेकानंद बड़े स्‍वपन्‍द्रष्‍टा थे। उन्‍होंने एक नये समाज की कल्‍पना की थी, ऐसा समाज जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद नहीं रहे। उन्‍होंने वेदांत के सिद्धांतों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धांत की जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया, उससे सबल बौदि्धक आधार शायद ही ढूंढा जा सके। विवेकानन्‍द को युवकों से बड़ी आशाएं थीं। आज के युवकों के लिए ही इस ओजस्‍वी संन्‍यासी का यह जीवन-वृत्‍त लेखक उनके समकालीन समाज एवं ऐतिहासिक पृ‍ष्‍ठभूमि के संदर्भ में उपस्थित करने का प्रयत्‍न किया है यह भी प्रयास रहा है कि इसमें विवेकानंद के सामाजिक दर्शन एव उनके मानवीय रूप का पूरा प्रकाश पड़े।

आज के युवकों के लिये इस ओजस्‍वी सन्‍यासी का जीवन एक आदर्श है।

एक नजर में स्वामी विवेकानंद की जानकारी  – Swami Vivekananda Information :

1) कॉलेज में शिक्षा लेते समय वो ब्राम्हो समाज की तरफ आसक्त हुये थे. ब्राम्हो समाज के प्रभाव से वो मूर्तिपूजा और नास्तिकवाद इसके विरोध में थे. पर आगे 1882 में उनकी रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात हुई. ये घटना विवेकानंद के जीवन को पलटकर रखने वाली साबित हुयी. योग साधना के मार्ग से मोक्ष प्राप्ति की जा सकती है, ऐसा विश्वास रामकृष्ण परमहंस इनका था. उनके इस विचार ने विवेकानंद पर बहोत बड़ा प्रभाव डाला. और वो रामकृष्ण के शिष्य बन गये.

2) 1886 में रामकुष्ण परमहंस का देहवसान हुवा.

3) 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में धर्म की विश्व परिषद थी. इस परिषद् को उपस्थित रहकर स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म की साईड बहोत प्रभाव से रखी. अपने भाषण की शुरुवात ‘प्रिय-भाई-बहन’ ऐसा करके उन्होंने अपनी बड़ी शैली में हिंदू धर्म की श्रेष्ठता और महानता दिखाई.

4) स्वामी विवेकानंद के प्रभावी व्यक्तिमत्व के कारण और उनकी विव्दत्ता के कारण अमेरिका के बहोत लोग उनको चाहने लगे. उनके चाहने वालो ने अमेरिका में जगह जगह ऊनके व्याख्यान किये. विवेकानंद 2 साल अमेरिका में रहे. उन दो सालो में उन्होंने हिंदू धर्म का विश्वबंधुत्व का महान संदेश वहा के लोगों तक पहुचाया. उसके बाद स्वामी विवेकानंद इग्लंड गये. वहा की मार्गारेट नोबेल उनकी शिष्या बनी. आगे वो बहन निवेदीता के नाम से प्रसिध्द हुई.

5) 1897  में उन्होंने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की. उसके साथ ही दुनिया में जगह जगह रामकृष्ण मिशन की शाखाये स्थापना की. दुनिया के सभी धर्म सत्य है और वो एकही ध्येय की तरफ जाने के अलग अलग रास्ते है. ऐसा रामकृष्ण मिशन की शिक्षा थी.

6) रामकृष्ण मिशन ने धर्म के साथ-साथ सामाजिक सुधार लानेपर विशेष प्रयत्न किये. इसके अलावा मिशन की तरफ से जगह-जगह अनाथाश्रम, अस्पताल, छात्रावास की स्थापना की गई.

7) अंधश्रध्दा, कर्मकांड और आत्यंतिक ग्रंथ प्रामान्य छोड़ो और  विवेक बुद्धिसे धर्म का अभ्यास करो. इन्सान की सेवा यही सच्चा धर्म है. ऐसी शिक्षा उन्होंने भारतीयों को दी. उन्होंने जाती व्यवस्था पर हल्ला चढाया. उन्होंने मानवतावाद और विश्वबंधुत्व इस तत्व का पुरस्कार किया. हिंदू धर्म और संस्कृति इनका महत्व विवेकानंद ने इस दुनिया को समझाया.

विशेषता  :-  स्वामी विवेकानंद का 12 जनवरी ये जन्मदिन ‘युवादीन’ रूप में मनाया जाता हैं.

मृत्यु  :-  4 जुलाई 1902  को स्वामी विवेकानंद दुनिया छोड़कर चले गये.

श्री रामकृष्ण परमहंस से प्रभावित होकर वे आस्तिकता की ओर उन्मुख हुए थे और उन्होंने सारे भारत में घूम-घूम कर ज्ञान की ज्योत जलानी शुरु कर दी.

“उठो, जागो और तब तक रुको नहीं

जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये !!”

स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे इस वाक्य ने उन्हें विश्व विख्यात बना दिया था. और यही वाक्य आज कई लोगो के जीवन का आधार भी बन चूका है. इसमें कोई शक नहीं की स्वामीजी आज भी अधिकांश युवाओ के आदर्श व्यक्ति है. उनकी हमेशा से ये सोच रही है की आज का युवक को शारीरिक प्रगति से ज्यादा आंतरिक प्रगति करने की जरुरत है. आज के युवाओ को अलग-अलग दिशा में भटकने की बजाये एक ही दिशा में ध्यान केन्द्रित करना चाहिये. और अंत तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिये. युवाओ को अपने प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करना चाहिये.

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