Netaji Subhas Chandra Bose Biography in Hindi | नेताजी सुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक और जय हिन्द का नारा देने वाले सुभाष चन्द्र बोस जी की जयंती हर वर्ष 23 जनवरी को मनाई जाती है। वीर सैनिक, राजनीति के अद्भुत खिलाड़ी सुभाष चंद्र बोस ने जन-चेतना में आजादी की महत्ता को बहुत ही प्रभावशाली तरीके से संप्रेषित किया। उन्होंने सर्वहारा, युवा, छात्र, महिलाओं तथा लगभग सभी वर्गों में उन्होंने स्वतंत्रता-आंदोलन में सक्रिय सहयोग की अनिवार्य चेतना को जगाया।

अपनी विशिष्टता तथा अपने व्यक्तित्व एवं उपलब्धियों की वजह से सुभाष चन्द्र बोस भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भारत की आजादी के आंदोलन में ऐसे अनेक क्रांतिकारी उभरे जिन्होंने मुल्क को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और हमेशा के लिए अपने देशवासियों के दिलों पर छा गए। ऐसे ही एक क्रांतिकारी हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपना सबकुछ देश की आजादी के लिए दांव पर लगा दिया।

20वीं सदी के मध्य और अंत में कई छात्र एवं युवा संगठनों का जन्म हुआ। ये साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन को पूर्ण स्वराज की मांग द्वारा एक समग्र रूप देना चाहते थे और राष्ट्रवाद को समाजवाद के साथ मिलाने पर जोर दे रहे थे। 

1920-30 के दशक में भारतीय राजनीति में प्रभावशाली वामपंथी समूहों का उदय हुआ। भारतीय युवाओं के बीच समाजवाद एक सिद्धांत बन गया। ऐसे वक्त में सुभाष चंद्र बोस युवाओं के एक नायक के तौर पर उभरे। वह अपने दृढ़ संकल्प, अजेय साहस, अपूर्व त्याग और अद्भुत शौर्य के साथ मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए बिना किसी साधन और सहायता के एक आदर्श स्थापित कर चुके थे। 


Netaji Subhas Chandra Bose Biography in Hindi | नेताजी सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस  का जन्म दिवस और जन्म स्थान Subhash Chandra Bose's birthday and place of birth

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। इन्ही के जन्म वर्षगांठ के उपलक्ष में प्रतिवर्ष 23 जनवरी को सुभाष चन्द्र बोस जी की जयंती मनाई जाती है। 

सुभाष चंद्र बोस के माता-पिता और परिवार Parents and Family of Subhas Chandra Bose

उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे। 

जानकीनाथ बोस ने लम्बे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरद चन्द्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थे। सुभाष उन्हें मेजदा कहते थे। शरदबाबू की पत्नी का नाम विभावती था।

सुभाष चंद्र बोस का विवाह Subhash Chandra Bose's marriage

सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं।

सन् 1934 में जब सुभाष चंद्र बोस ऑस्ट्रिया में अपना इलाज कराने हेतु ठहरे हुए थे। उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने हेतु एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की आवश्यकता हुई। उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल (Emilie Schenkl) नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात करा दी। एमिली के पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। सुभाष चंद्र बोस एमिली की ओर आकर्षित हुए और उन दोनों में स्वाभाविक प्रेम हो गया। 

नाजी जर्मनी के सख्त कानूनों को देखते हुए उन दोनों ने सन् 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिन्दू पद्धति से विवाह रचा लिया। वियेना में एमिली ने एक पुत्री को जन्म दिया। सुभाष ने उसे पहली बार तब देखा जब वह मुश्किल से चार सप्ताह की थी। उन्होंने उसका नाम अनिता बोस रखा था। अगस्त 1945 में ताइवान में हुई तथाकथित विमान दुर्घटना में जब सुभाष की मृत्यु हो गई। उस समय अनिता पौने तीन साल की थी। अनिता अभी जीवित है। उसका नाम अनिता बोस फाफ Anita Bose Pfaff है। अपने पिता के परिवार जनों से मिलने अनिता फाफ कभी-कभी भारत भी आती है।

सुभाष चंद्र बोस का प्रारम्भिक जीवन Early Life of Subhash Chandra Bose

रेवेंशॉव स्कूल के प्रधानाचार्य बेनीमाधव दास का सुभाष के युवा मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। माधव दास ने इन्हें नैतिक मूल्यों पर चलने की शिक्षा दी साथ ही ये भी सीख दी कि असली सत्य प्रकृति में निहित है, अतः इसमें स्वंय को पूरी तरह से समर्पित कर दो। जिसका परिणाम ये हुआ कि ये नदी के किनारों और टीलों व प्राकृतिक सौंन्दर्य से पूर्ण एकांत स्थानों को खोजकर ध्यान साधना में घंटों लीन रहने लगे।

सुभाष चन्द्र के सभा और योगाचार्य के कार्यों में लगे रहने के कारण इनके परिवार वाले व्यवहार से चिन्तित होने लगे। क्योंकि ये अधिक से अधिक समय अकेले बिताते थे। परिवार वालों को इनके भविष्य के बारे में चिन्ता होने लगी। वे सोचने लगे कि इतना होनहार और मेधावी होने के बाद भी ये पढ़ाई में पिछड़ न जाये। परिवार की आशाओं के विपरीत 1912-13 में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया, जिससे इनके माता-पिता बहुत खुश हुये।

शुरुआत में तो नेताजी की देशसेवा करने की बहुत मंशा थी, पर अपने परिवार की वजह से उन्होंने विदेश जाना स्वीकार किया। पिता के आदेश का पालन करते हुए, वे 15 सितम्बर 1919 को लंदन गए और वहां कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन करने लगे। वहां से उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की और योग्यता सूची में चौथा स्थान प्राप्त किया। परन्तु वे देश की सेवा करने का मन बना चुके थे। इसी कारण नेताजी ने आई.सी.एस. से त्याग पत्र दे दिया। 

सुभाष चंद्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा Elementary education of Subhash Chandra Bose

सुभाष चन्द्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा कटक के ही स्थानीय मिशनरी स्कूल में हुई। इन्हें 1902 में प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में प्रवोश दिलाया गया। ये स्कूल अंग्रेजी तौर-तरीके पर चलता था जिससे इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की अंग्रेजी अन्य भारतीय स्कूलों के छात्रों के मुकाबले अच्छी थी। ऐसे स्कूल में पढ़ने के और भी फायदे थे जैसे अनुशासन, उचित व्यवहार और रख-रखाव आदि। इनमें भी अनुशासन और नियमबद्धता बचपन में ही स्थायी रुप से विकसित हो गयी। इस स्कूल में पढ़ते हुये इन्होंने महसूस किया कि वो और उनके साथी ऐसी अलग-अलग दुनिया में रहते हैं जिनका कभी मेल नहीं हो सकता। सुभाष शुरु से ही पढ़ाई में अच्छे नंबरों से प्रथम स्थान पर आते थे लेकिन वो खेल कूद में बिल्कुल भी अच्छे नहीं थे। जब भी किसी प्रतियोगिता में भाग लेते तो उन्हें हमेशा शिकस्त ही मिलती।

सुभाष चंद्र बोस की उच्च शिक्षा | Higher Education of Subhash Chandra Bose

1909 में इनकी मिशनरी स्कूल से प्राइमरी की शिक्षा पूरी होने के बाद इन्हें रेवेंशॉव कॉलेजिएट में प्रवोश दिलाया गया। इस स्कूल में प्रवोश लेने के बाद बोस में व्यापक मानसिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आये। ये विद्यालय पूरी तरह से भारतीयता के माहौल से परिपूर्ण था। सुभाष पहले से ही प्रतिभाशाली छात्र थे, बस बांग्ला को छोड़कर सभी विषयों में अव्वल आते थे। इन्होंने बांग्ला में भी कड़ी मेहनत की और पहली वार्षिक परीक्षा में ही अच्छे अंक प्राप्त किये। बांग्ला के साथ-साथ इन्होंने संस्कृत का भी अध्ययन करना शुरु कर दिया।

सुभाष चंद्र बोस की स्वतंत्रता के लिए पहली आवाज Subhash Chandra Bose First Voice for Freedom

वर्ष 1930 के दशक के मध्य में बोस ने यूरोप की यात्रा की। उन्होंने पहले शोध किया तत्पश्चात् ‘द इंडियन स्ट्रगल’ नामक पुस्तक का पहला भाग लिखा, जिसमें उन्होंने वर्ष 1920-1934 के दौरान होने वाले देश के सभी स्वतंत्रता आंदोलनों को कवर किया। बोस ने वर्ष 1938 (हरिपुरा) में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया।

सुभाष चंद्र बोस द्वारा INA का गठन | Formation of INA by Subhash Chandra Bose

INA का गठन पहली बार मोहन सिंह और जापानी मेजर इविची फुजिवारा (Iwaichi Fujiwara) के नेतृत्त्व में किया गया था तथा इसमें मलायन (वर्तमान मलेशिया) अभियान में जापान ने सिंगापुर पर कब्जा कर लिया। ब्रिटिश-भारतीय सेना के युद्ध के भारतीय कैदियों को शामिल किया गया था।

सुभाष चंद्र बोस द्वारा आजाद हिन्द फौज का गठन Formation of Azad Hind Fauj by Subhash Chandra Bose

नेताजी भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के सबसे अग्रणी नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिए, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के कैथी सिनेमा हॉल में आजाद हिंद सरकार की स्थापना की घोषणा की थी। वहां पर नेताजी स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री, युद्ध एवं विदेशी मामलों के मंत्री और सेना के सर्वोच्च सेनापति चुने गए थे।

उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा का नारा भी उनके द्वारा दिया गया था, जो अब भी हमारे देश के युवाओं को प्रेरित करती है। भारत में लोग उन्हें ‘नेता जी’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। भारतीय इतिहास के इसी महानायक के त्याग और बलिदान ने भारत को आदाज़ी का रास्ता दिखाया था। नेताजी ने दुनियां में जहां पहली महिला फ़ौज का गठन किया वहीं कूटनीतिक प्रयासों के जरिए आज़ाद हिन्द सरकार बनाई।

कर्मठ और साहसी व्यक्तित्व वाले नेताजी ने आजाद हिन्द फौज के नाम अपने अंतिम संदेश में बड़े प्रभावशाली ढंग से यही बात कही थी. ‘‘भारतीयों की भावी पीढ़ियां, जो आप लोगों के महान बलिदान के फलस्वरूप गुलामों के रूप में नहीं, बल्कि आजाद लोगों के रूप में जन्म लेंगी. आप लोगों के नाम को दुआएं देंगी. और गर्व के साथ संसार में घोषणा करेंगी कि अंतिम सफलता और गौरव के मार्ग को प्रसस्त करने वाले आप ही लोग उनके पूर्वज थे”.

आजाद हिन्द फौज के विघटन पर देशवासियों के नाम संदेश | Message to the countrymen on the disintegration of Azad Hind Fauj

“भारतीय स्वाधीनता संग्राम का पहला अध्याय पूरा हुआ और इस अध्याय में पूर्व एशियाई बेटे-बेटियों का स्थान अमिट रहेगा। हमारी अस्थाई असफलता से निराश न हो। दुनिया की कोई ताकत भारत को गुलाम नहीं रख सकती।”

उस समय के उपलब्ध सुत्रों के अनुसार ये कहा जाता हे कि रंगून में पराजय के बाद बैंकॉक लौटते समय से ही नेताजी ने सोवियत रुस जाने का निर्णय कर लिया था। 15 अगस्त 1945 को नेताजी ने अपनी अस्थाई सरकार के साथ अन्तिम बैठक की गयी जिसमें फैसला किया गया कि आबिद हसन, देवनाथ दास, नेताजी हबीबुर्रहमान, एस.ए.अय्यर और कुछ अन्य साथियों के साथ बोस टोकियों से चले जाये। ये लोग विमान से बैंकॉक और सैगोन रुकते हुये रुस के लिये गये।

सुभाष चंद्र बॉस की देशबंधु चितरंजन से मिलान | Matching Subhash Chandra Boss with Deshbandhu Chittaranjan

भारत आकर वे देशबंधु चितरंजन दास के सम्पर्क में आए और उन्होंने उनको अपना गुरु मान लिया और कूद पड़े देश को आजाद कराने. चितरंजन दास के साथ उन्होंने कई अहम कार्य किए जिनकी चर्चा इतिहास का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सुभाष चन्द्र बोस की सराहना हर तरफ हुई. देखते ही देखते वह एक महत्वपूर्ण युवा नेता बन गए. पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाषबाबू ने कांग्रेस के अंतर्गत युवकों की इंडिपेंडेंस लीग शुरू की.

लेकिन बोस के गर्म और तीखे तेवरों को कांग्रेस का नरम व्यवहार ज्यादा पसंद नहीं आया. उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को कलकत्ता में हुई कांग्रेस की बैठक में अपना त्याग पत्र दे दिया और 3 मई 1939 को सुभाषचन्द्र बोस ने कलकत्ता में फॉरवर्ड ब्लाक अर्थात अग्रगामी दल की स्थापना की. सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्व प्रांरभ हुआ. ब्रिटिश सरकार ने सुभाष के युद्ध विरोधी आन्दोलन से भयभीत होकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. सन् 1940 में सुभाष को अंग्रेज सरकार ने उनके घर पर ही नजरबंद कर रखा था. नेताजी अदम्य साहस और सूझबूझ का परिचय देते हुए सबको छकाते हुए घर से भाग निकले.

नेताजी सुभाषचंद्र बोस का राजनैतिक जीवन | Political Life of Netaji Subhash Chandra Bose

सिविल सर्विसेज की नौकरी छोड़कर वापस भारत लौटते ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वतंत्रता की लड़ाई या क्रांति में कूद गए | नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस पार्टी को ज्वाइन किया | शुरुवात में नेताजी सुभाषचंद्र बोस कलकत्ता में कांग्रेस पार्टी के नेता रहे थे | चितरंजन दास जी के नेतृत्व में नेताजी सुभाषचंद्र बोस काम करते थे | नेताजी सुभाषचंद्र बोस चितरंजन दास जी को अपना राजनीती गुरु के रूप में मानते थे | 1922 में चितरंजन दास जी ने मोतीलाल नेहरु के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को छोड़ कर अपनी एक अलग पार्टी जिसका नाम था स्वराज पार्टी बना ली थी | जब चितरंजन दास जी अपनी स्वराज पार्टी के साथ मिल रणनीति बना रहे थे तब नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने उस बीच कलकत्ता, पश्चिम बंगाल के नोजवान, छात्र-छात्रा व मजदूर लोगों के बीच अपनी एक विशेष पहचान बना ली थी | नेताजी सुभाषचंद्र बोस जल्द से जल्द हमारे पराधीन भारत को स्वाधीन भारत के रूप में देखने का अरमान रखते थे |

जापान से मदद और हिटलर से मुलाकात | Help from Japan and meeting with Hitler

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब नेता जी ने जापान और जर्मनी से मदद लेने की कोशिश की थी तो ब्रिटिश सरकार को यह बात खटकने लगी और गुप्तचरों को 1941 में उन्हें खत्म करने का आदेश दिया।

नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए दिल्ली चलो! का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

नेताजी ने एक मुसलमान मौलवी का वेष बनाकर पेशावर अफगानिस्तान होते हुए बर्लिग तक का सफर तय किया. बर्लिन में जर्मनी के तत्कालीन तानाशाह हिटलर से मुलाकात की और भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जर्मनी व जापान से सहायता मांगी. जर्मनी में भारतीय स्वतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की. इसी दौरान सुभाषबाबू, नेताजी नाम से जाने जाने लगे. पर जर्मनी भारत से बहुत दूर था. इसलिए 3 जून 1943 को उन्होंने पनडुब्बी से जापान के लिए प्रस्थान किया. पूर्व एशिया और जापान पहुंच कर उन्होंने आजाद हिन्द फौज का विस्तार करना शुरु किया. पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थानीय भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और आर्थिक मदद करने का आह्वान किया. उन्होंने अपने आह्वान में संदेश दिया “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा.”

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया. अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया. दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंडमान और निकोबार द्वीप जीत लिए पर अंत में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और आजाद हिन्द फौज को पीछे हटना पड़ा.

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था. उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था. 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गए. इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिए. 

आज़ाद हिन्द सरकार | Azad Hind Government

21 अक्टूबर 1943 में सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति थे और इस अधिकार से वे स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड सहित 11 देशो की सरकारों ने मान्यता दी थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।

1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया। कोहिमा का युद्ध 4 अप्रैल 1944 से 22 जून 1944 तक लड़ा गया एक भयंकर युद्ध था। इस युद्ध में जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था और यही एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना | Establishment of Azad Hind Radio

आज़ाद हिंद रेडियो का आरंभ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्त्व में 1942 में जर्मनी में किया गया था। इस रेडियो का उद्देश्य भारतीयों को अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु संघर्ष करने के लिये प्रचार-प्रसार करना था।

आजाद हिंद रेडियो पर महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा | Mahatma Gandhi was called 'Father of the Nation' on Azad Hind Radio

6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्देश्य के बारे में बताया. इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गांधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद मांगा. इस प्रकार, नेताजी ने गांधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया. 

विवेकानंद की शिक्षा का प्रभाव | Influence of Vivekananda's education

सुभाष चंद्र बोस, विवेकानंद की शिक्षाओं से अत्यधिक प्रभावित थे और उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे, जबकि चित्तरंजन दास उनके राजनीतिक गुरु थे। वर्ष 1921 में बोस ने चित्तरंजन दास की स्वराज पार्टी द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र ‘फॉरवर्ड’ के संपादन का कार्यभार संभाला।

वर्ष 1923 में बोस को अखिल भारतीय युवा कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष और साथ ही बंगाल राज्य कांग्रेस का सचिव चुना गया। वर्ष 1925 में क्रांतिकारी आंदोलनों से संबंधित होने के कारण उन्हें माण्डले (Mandalay) कारागार में भेज दिया गया जहाँ वह तपेदिक की बीमारी से ग्रसित हो गए।

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु | Subhash Chandra Bose's death

सैगोन में नेताजी को बड़े जापानी विमान में बिठा दिया गया। नेताजी ने इस विमान से हबीबुर्रहमान के साथ यात्रा की। 18 अगस्त को ये लड़ाकू विमान से ताइवान के लिये गये और इसके बाद इनका विमान रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया। 23 अक्टूबर 1945 को टोकियों के रेडियो प्रसारण ने एक सूचना प्रसारित की कि ताइहोकू हवाई अड्डे पर विमान उड़ान भरते समय ही दुर्घटना ग्रस्त हो गया, जिसमें चालक और इनके एक साथी की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी और नेताजी आग से बुरी तरह झुलस गये। इन्हें वहाँ के सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया और इसी अस्पताल में इन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांस ली।

आम थ्योरी कहती है कि बोस की मृत्यु 1945 में एक प्लेन क्रैश में हो गई थी। लेकिन क्या ये सच्चाई है? उसके बाद भी कई लोगों ने ये दावा किया कि उन्होंने बोस को जिंदा देखा है। कुछ का कहना था कि बोस रशिया चले गए थे।  इसी तरह का दावा करती है एक किताब "Bose: The Indian Samurai - Netaji and the INA Military Assessment". ये किताब सबसे पहले 2016 में पब्लिश की गई थी। इस किताब में लिखा गया है बोस प्लेन क्रैश में नहीं मरे थे। ये किताब रिटायर्ड मेजर जनरल जी डी बक्शी ने लिखी है।

प्रमुख भूमिका निभाने वाले नेताजी के बारे में जानकारी | Information about Netaji who played the lead role :-

  • 1913 : उन्‍होंने 1913 में अपनी कॉलेज शिक्षा की शुरुआत की और कलकत्‍ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया।
  • 1915 : सन् 1915 में उन्‍होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण की।
  • 1916 : ब्रिटिश प्रोफेसर के साथ दुर्व्‍यवहार के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया गया।
  • 1917 : सुभाषचंद्र ने 1917 में स्‍कॉटिश चर्च कॉलेज में फिलॉसफी ऑनर्स में प्रवेश लिया।
  • 1919 : फिलॉसफी ऑनर्स में प्रथम स्‍थान अर्जित करने के साथ आईसीएस परीक्षा देने के लिए इंग्‍लैंड रवाना हो गए।
  • 1920 : सुभाषचंद्र बोस ने अंग्रेजी में सबसे अधिक अंक के साथ आईसीएस की परीक्षा न केवल उत्‍तीर्ण की, बल्‍कि चौथा स्‍थान भी प्राप्‍त किया।
  • 1920 : उन्‍हें कैंब्रिज विश्‍वविद्यालय की प्रतिष्‍ठित डिग्री प्राप्‍त हुई।
  • 1921 : अंग्रेजों ने उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया।
  • 1922 : 1 अगस्‍त, 1922 को वे जेल से बाहर आए और देशबंधु चितरंजनदास की अगुवाई में गया कांग्रेस अधिवेशन में स्‍वराज दल में शामिल हो गए।
  • 1923 : सन् 1923 में वे भारतीय युवक कांग्रेस के अध्‍यक्ष चुने गए। इसके साथ ही बंगाल कांग्रेस के सचिव भी चुने गए। उन्‍होंने देशबंधु की स्‍थापित पत्रिका ‘फॉरवर्ड’ का संपादन करना शुरू किया।
  • 1924 : स्‍वराज दल को कलकत्‍ता म्‍युनिसिपल चुनाव में भारी सफलता मिली। देशबंधु मेयर बने और सुभाषचंद्र बोस को मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी मनोनीत किया गया। सुभाष के बढ़ते प्रभाव को अंग्रेज सरकार बरदाश्‍त नहीं कर सकी और अक्‍टूबर में ब्रिटिश सरकार ने एक बार फिर उन्‍हें गिरफ्तार कर लिया।
  • 1927 : नेताजी, जवाहरलाल नेहरू के साथ अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के साधारण सचिव चुने गए। 
  • 1928 : स्‍वतंत्रता आंदोलन को धार देने के लिए उन्‍होंने भारतीय कांग्रेस के कलकत्‍ता अधिवेशन के दौरान स्‍वैच्‍छिक संगठन गठित किया। नेताजी इस संगठन के जनरल ऑफिसर-इन-कमांड चुने गए।
  • 1930 : उन्‍हें जेल भेज दिया गया। जेल में रहने के दौरान ही उन्‍होंने कलकत्‍ता के मेयर का चुनाव जीता।
  • 1931 : 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह को फांसी दे दी गई, जो कि नेताजी और महात्‍मा गांधी में मतभेद का कारण बनी।
  • 1932-1936 : नेताजी ने भारत की आजादी के लिए विदेशी नेताओं से दबाव डलवाने के लिए इटली में मुसोलिनी, जर्मनी में फेल्‍डर, आयरलैंड में वालेरा और फ्रांस में रोमा रोनांड से मुलाकात की।
  • 1936 : 13 अप्रैल, 1936 को भारत आने पर उन्‍हें बंबई में गिरफ्तार कर लिया गया।
  • 1936-37 : रिहा होने के बाद उन्‍होंने यूरोप में ‘इंडियन स्‍ट्रगल’ प्रकाशित करना शुरू किया।
  • 1938 : हरिपुर अधिवेशन में कांग्रेस अध्‍यक्ष चुने गए। इस बीच शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्‍हें सम्‍मानित किया।
  • 1939 : महात्‍मा गांधी के उम्‍मीदवार सीतारमैया को हराकर एक बार फिर कांग्रेस के अध्‍यक्ष बने। बाद में उन्‍होंने फॉरवर्ड ब्‍लॉक की स्‍थापना की।
  • 1940 : उन्‍हें नजरबंद कर दिया गया। इस बीच उपवास के कारण उनकी सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
  • 1941 : एक नाटकीय घटनाक्रम में वे 7 जनवरी, 1941 को गायब हो गए और अफगानिस्‍तान और रूस होते हुए जर्मनी पहुंचे।
  • 1941 : 9 अप्रैल, 1941 को उन्‍होंने जर्मन सरकार को एक मेमोरेंडम सौंपा जिसमें एक्‍सिस पॉवर और भारत के बीच परस्‍पर सहयोग को संदर्भित किया गया था। सुभाषचंद्र बोस ने इसी साल नवंबर में स्‍वतंत्र भारत केंद्र और स्‍वतंत्र भारत रेडियो की स्‍थापना की।
  • 1943 : वे नौसेना की मदद से जापान पहुंचे और वहां पहुंचकर उन्‍होंने टोकियो रेडियो से भारतवासियों को संबोधित किया। 21 अक्‍टूबर, 1943 को उन्होंने आजाद हिन्‍द सरकार की स्‍थापना की और इसकी स्‍थापना अंडमान और निकोबार में की गई, जहां इसका 'शहीद और स्‍वराज' नाम रखा गया।
  • 1944 : आजाद हिन्‍द फौज अराकान पहुंची और इम्फाल के पास जंग छिड़ी। फौज ने कोहिमा (इम्फाल) को अपने कब्‍जे में ले लिया।
  • 1945 : दूसरे विश्‍वयुद्ध में जापान ने परमाणु हमले के बाद हथियार डाल दिए। इसके कुछ दिनों बाद नेताजी की हवाई दुर्घटना में मारे जाने की खबर आई। हालांकि इस बारे में कोई प्रत्‍यक्ष प्रमाण नहीं प्राप्‍त हुए हैं।

सुभाष चन्द्र बोस द्वारा लिखी गयी पुस्तकें | Books written by Subhash Chandra Bose

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष।

आजाद हिन्द।

तरुनेर सपना।

अल्टरनेटिव लीडरशिप।

जरुरी कीचू लेखा।

द एसेंशशियल राइटिंग्स ऑफ सुभाष चन्द्र बोस।

5th सुभाष चन्द्र बोस समग्र।

संग्राम रंचनाबली।

चलो दिल्ली: राइटिंग्स़ एंड स्पीच, 1943 -1945।

आइडियाज़ ऑफ ए नेशन: सुभाष चन्द्र बोस।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, द लास्ट फेस इन हिस ओन वर्ल्डस।

इंडियाज़ स्पोक मैन अब्रॉड: लेटर्स, आर्टिकल्स, स्पीचस़ एंड सेटलमेंट।

लाइफ एंड टाइम्स ऑफ सुभाष चन्द्र बोस, एज़ टोल्ड इन हिज़ ओन वर्ड्स।

सेलेक्टेड स्पीचस़।

सुभाष चन्द्र बोस एजेंडा फॉर आजाद हिन्द।

स्वतंत्रता के बाद भारत: सुभाष चन्द्र बोस के चुनिंदा भाषण।

तरुणाई के सपने।

एट द क्रॉस रोड़स़ ऑफ चेंज़।

सुभाष चन्द्र बोस के कथन या नारे | Sayings or slogans of Subhash Chandra Bose

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा !”

“राष्ट्रवाद, मानव जाति के उच्चतम आदर्श सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् से प्रेरित है।”

“मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश की प्रमुख समस्याओं जैसे गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, कुशल उत्पादन एवं वितरण का समाधान सिर्फ समाजवादी तरीके से ही किया जा सकता है।”

“ये हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी स्वतंत्रता का मोल अपने खून से चुकाएं। हमें अपने बलिदान और परिश्रम से जो आज़ादी मिलेगी, हमारे अन्दर उसकी रक्षा करने की ताकत होनी चाहिए।”

“मध्या भावो गुडं दद्यात - अर्थात् जहाँ शहद का अभाव हो वहां गुड़ से ही शहद का कार्य निकालना चाहिए!”

“भारत में राष्ट्रवाद ने एक ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अन्दर से सुसुप्त पड़ी थी।”

“आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए, मरने की इच्छा ताकि भारत जी सके! एक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके।”

“यदि आपको अस्थायी रूप से झुकना पड़े तब वीरों की भाँति झुकना !”

“मुझे ये नहीं मालूम की स्वतंत्रता के इस युद्ध में हम में से कौन-कौन जीवित बचेंगा! परन्तु मैं ये जानता हूँ, अंत में विजय हमारी ही होगी!”

“असफलताएँ कभी-कभी सफलता की स्तम्भ होती हैं !”

“समझौतापरस्ती बहुत अपवित्र वस्तु है !”

“कष्टों का निसंदेह एक आंतरिक नैतिक मूल्य होता है !”

“मैंने जीवन में कभी भी खुशामद नहीं की है! दूसरों को अच्छी लगने वाली बातें करना मुझे नहीं आता!”

“संघर्ष ने मुझे मनुष्य बनाया! मुझमें आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ, जो पहले नहीं था!”

“समय से पूर्व की परिपक्वता अच्छी नहीं होती, चाहे वह किसी वृक्ष की हो, या व्यक्ति की और उसकी हानि आगे चल कर भुगतनी ही होती है!”

“मैं जीवन की अनिश्चितता से जरा भी नहीं घबराता!”

“मुझमें जन्मजात प्रतिभा तो नहीं थी, परन्तु कठोर परिश्रम से बचने की प्रवृति मुझमे कभी नहीं रही!”

“अपने कॉलेज जीवन की दहलीज़ पर खड़े होकर मुझे अनुभव हुआ, जीवन का अर्थ भी है और उद्देश्य भी!”

“भविष्य अब भी मेरे हाथ में है!”

“चरित्र निर्माण ही छात्रों का मुख्य कर्तव्य है!”

“कर्म के बंधन को तोड़ना बहुत कठिन कार्य है!”

“माँ का प्यार सबसे गहरा और स्वार्थ रहित होता है! इसको किसी भी प्रकार नापा नहीं जा सकता!”

“याद रखिये अन्याय सहना और गलत के साथ समझौता करना सबसे बड़ा अपराध है।”

“एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक दोनों ही प्रशिक्षण की ज़रुरत होती है।”

“इतिहास साक्षी है कि केवल विचार-विमर्श से कोई ठोस परिवर्तन नहीं हासिल किया गया है।”

स्वाधीनता संग्राम के अन्तिम पच्चीस वर्षों के दौरान उनकी भूमिका एक सामाजिक क्रांतिकारी की रही और वे एक अद्वितीय राजनीतिक योद्धा के रूप में उभर के सामने आए. सुभाष चन्द्र बोस का जन्म उस समय हुआ जब भारत में अहिंसा और असहयोग आन्दोलन अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थे. इन आंदोलनों से प्रभावित होकर उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. पेशे से बाल चिकित्सक डॉ बोस ने नेताजी की राजनीतिक और वैचारिक विरासत के संरक्षण के लिए नेताजी रिसर्च ब्यूरो की स्थापना की. नेताजी का योगदान और प्रभाव इतना बडा था कि कहा जाता हैं कि अगर आजादी के समय नेताजी भारत में उपस्थित रहते, तो शायद भारत एक संघ राष्ट्र बना रहता और भारत का विभाजन न होता। 

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